ये हैं बुंदेलखंड की पैड-वूमेन, खुद बनाती हैं पैड…..

अक्षय कुमार की मूवी पैडमैन का असर बुंदेलखंड के बांदा में दिखाई दे रहा है जहां तमाम समाजिक कार्यों में

अक्षय कुमार की मूवी पैडमैन का असर बुंदेलखंड के बांदा में दिखाई दे रहा है जहां तमाम समाजिक कार्यों में अगुआ रहने वाली अल्फिजा संस्थान की संचालिका रूबी जैनब बुंदेलखंड की पैड वुमैन बनकर सामने आई है। यूं तो सामाजिक कार्यों में लगा यह संस्थान पिछले पाँच सालों से महिलाओं के सामाजिक स्तर और उत्थान करने के लिए काम कर रहा है, लेकिन इन दिनों इस संस्थान की महिलाओं के द्वारा बनाए जा रहे सस्ते साफ और स्वच्छ सेनेटरी पैड के लिए खासा चर्चा में है महिलाओं की समस्या को कम करने के लिए इस संस्थान में महिलाओं के द्वारा सस्ती दरों पर सेनेटरी पैड बनाए जा रहे हैं और इसका निर्माण कार्य करने में हाइजीन का खास ख्याल रखा जा रहा है।

महिलाओं द्वारा सेनेटरी पैड निर्माण के समय सबसे पहले हाथों को सेनेटाइज किए जाता है उसके बाद सर्जिकल ग्लोव्स और कैप को लगाकर पैड बनाने का काम किया जाता है। यह सेनेटरी पैड मैनुअल यानी कि बगैर किसी मशीन के सहारे बनाया जाता है ऐसा भी नहीं है कि महिलाएं मशीन से पैड बनाना नहीं चाहती लेकिन आर्थिक विपन्नता के कारण मशीन नहीं उपलब्ध हो पा रही है इसलिए संस्था की महिलाओं के द्वारा यह काम बगैर मशीन के किए जा रहा है।

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इस तस्वीर में महिलाओं द्वारा हाथ से बगैर किसी मशीन का उपयोग के सेनेटरी पैड बनाया जा रहा है। साफ सेनेटाइज रुई और पट्टी, नैपकिन का इस्तेमाल करके इन सेनेटरी पैड का निर्माण किया जा रहा है।

संस्था के संचालक संचालिका रूबी जैनब ने बताया की महिलाओं की इस समस्या से वह किशोरावस्था से वाकिफ है और कई बार समस्याओं का सामना भी किया है। उन्होंने बताया है कि हमने देखा महिलाएं कभी राख कभी गंदा कपड़ा का इस्तेमाल किया करतीं थीं जिससे कैंसर तक होने की समस्या हो जाती है उनका कहना है की बहुत दिन से सोच रहे थे कि समस्या का हल होना चाहिए लेकिन कभी हिम्मत नहीं पड़ी क्योंकि इस काम के बारे में कोई भी जानकारी हमको ना थी लेकिन लगभग 2 वर्ष पहले बॉलीवुड की पैडमैन मूवी देखने के बाद यह समझ में आया की यह काम बहुत सरल और आसान है और घर में ही किया सकता है तो मन तो बनाया लेकिन अभी भी आर्थिक समस्या आड़े आ गई जिस कारण सेनेटरी पैड का कार्य नहीं शुरु कर सकें और मन की इच्छा मन में ही रह गई लेकिन अब हमें डॉक्टर शबाना रफीक का साथ मिला है और वह हमको आर्थिक मदद कर रही हैं इसलिए हमें इस काम की शुरुआत की है और अब हम इस कार्य के माध्यम से महिलाओं को रोजगार भी उपलब्ध करा रहे हैं लेकिन कम पूंजी होने के कारण काम को बढ़ा नहीं पा रहे हैं लेकिन हम इस सामाजिक कार्य से पीछे हटने वाले नहीं हैं हम लगातार इस क्षेत्र में काम करते रहेंगे

संस्थान को सहयोग करने वाली डॉक्टर शबाना रफीक से हमने बात की तो डॉ शबाना रफीक ने बताया कि वह लखनऊ की रहने वाली है और 47 साल से मेडिकल प्रोफेशन नहीं जिसमें 8 साल पढ़ाई की और 39 साल से प्रैक्टिस कर रही है। उन्होंने कहा कि जब बाँदा आई तो मैंने देखा सेनेटरी पैड की जगह जाने क्या क्या इस्तेमाल कर रहे हैं, कभी मिट्टी कभी राख और कभी गंदे कपड़े कई बार धोकर इस्तेमाल करते हैं इतने सालों में मैंने देखा कि उन्हें इससे ब्लीडिंग की प्रॉब्लम हो रही है इनसे उन्हें इंफेक्शन हो रहा है यहां तक कि उन्हें कैंसर तक होने की संभावना है, इसलिए मेरे दिमाग में आया कि इस प्रोजेक्ट पर काम किया जाए और मैंने यह स्वच्छ सस्ते सैलेरी पैड का प्रोजेक्ट संस्थान को दे दिया।

Report-इल्यास खान

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