शरद पूर्णिमा : आज रात चांद की किरणों से होगी अमृत की वर्षा…

आज शाम को 5 बजकर 22 मिनट पर चतुर्दशी समाप्त हो जाएगी और पूर्णिमा प्रारम्भ हो जाएगी जो कल 31 अक्टूबर को शाम 7 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। इस कारण शरद पूर्णिमा आज ही मनाई जाएगी। धर्म शास्त्रीय मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा को रात्रि में चांद की किरणों से अमृत की वर्षा होती है। इसलिए रात को दूध की खीर बनाकर छत पर रखें और शनिवार को सुबह प्रसाद ग्रहण करें।। कृष्णम वन्दे जगदगुरूम।

शरद पूर्णिमा आज यानि 30 अक्टूबर शुक्रवार को मनाई जाएगी। आज के दिन घर में पकवान बनते है और साथ मीठी स्वादिष्ट खीर भी बनायीं जाती है। इसके बाद खीर को खुले आसमान के नीचे रातभर के  रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि आसमान से अमृत की वर्षा होती है और खुले आसमान के नीचे रातभर में खीर रखने से वो भी अमृत सामान हो जाती हैं।

लक्ष्मी स्त्रोत या कनक धारा स्त्रोत अवश्य पढ़ें

खीर रखने का शुभ मुहूर्त में खीर छत पर या चांद की रोशनी में रखी जाती है। इसका 16 कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा आपको बहुत लाभ देता है। 12 बजे खीर लाकर लक्ष्मी जी को भोग लगाकर खा लें।  दक्षिण में ऐसी मान्यता है कि लक्ष्मी जी शरद पूर्णिमा को धरती पर आती हैं।  लक्ष्मी स्त्रोत या कनक धारा स्त्रोत अवश्य पढ़ें।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात को चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर अमृत की वर्षा करते है। शरद पूर्णिमा को कौमुदी यानि मूनलाइट या कोजागरी पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।  इस पर्व पर चंद्रमा की रोशनी में खीर को रखा जाता है।

साफ चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर मां लक्ष्मी की ऐसे करें पूजन

शरद पूर्णिमा के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद एक साफ चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाकर मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें. इसके बाद अब लक्ष्मी जी विधि-विधान से पूजा करके लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करें। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के दिन इस स्तोत्र का पाठ करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।

मुहूर्त 

प्रात: 06:00 से 07:30 तक चर

प्रातः 07:30 से 09:00 तक लाभ

प्रातः 09:00 से 10:30 बजे तक अमृत

प्रातः10:30 बजे से 12:00 बजे तक काल

दोपहरः 12:00 से 01:30 बजे तक शुभ

दोपहरः 01:30 से 03:00 बजे तक रोग

दोपहरः 03:00 से 04:30 बजे तक उद्वेग

शामः 04:30 से 06:00 तक चर

इसलिए मनाई जाती है शरद पूर्णिमा

एक साहूकार की दो बेटियां थीं. दोनों पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। साहूकार की एक बार बड़ी बेटी ने पूर्णिमा का विधिवत व्रत किया, लेकिन छोटी बेटी ने व्रत छोड़ दिया, जिससे छोटी लड़की के बच्चों की जन्म लेते ही मृत्यु हो जाती थी। एक बार साहूकार की बड़ी बेटी के पुण्य स्पर्श से छोटी लड़की का बालक जीवित हो गया। कहा जाता है कि उसी दिन से यह व्रत विधिपूर्वक मनाया जाने लगा।

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