राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटी है मायावती की पार्टी बसपा

बसपा सुप्रीमो मायावती 2022 चुनावों के बहाने अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही हैं। इसके लिए मायावती शाम दाम दंड भेद लगाने को तैयार दिख रही हैं।

बसपा सुप्रीमो मायावती 2022 चुनावों के बहाने अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही हैं। इसके लिए मायावती शाम दाम दंड भेद लगाने को तैयार दिख रही हैं। पिछले कुछ सालों से हर चुनाव से पहले राजनीतिक पंडित, मीडिया और विपक्षी कहते हैं कि ‘मायावती का राजनीतिक करियर खत्म हो गई है, अब BSP का कोई अस्तितव नहीं रह गया है, मायावती अपनी राजनीतिक जमीन खो चुकी हैं.” लेकिन क्या ये सच है ये आनेवाला चुनाव ही बताएगा लेकिन जमीनी हकीकत को देखें तो ये बातें काफी हद तक सही ही साबित होती रही है।

एक तरफ बीजेपी ने उनके ओबीसी और दलित वोटबैंक में सेंध लगा दी है वहीं दुसरी ओर उनके ही समाज के चंद्रशेखर उनकी मुश्किलें बढ़ा रहे हैं और तो और खुद को मुस्लिमों के नेता साबित करने में जुटे औवैसी ने भी यूपी में एंट्री कर मायावती की टेंशन को और बढ़ा दिया है.

दरअसल, मायावती की राजनीतिक जान दलित वोटरों के हाथ में हैं. यूपी के 21% दलित वोटर जीत-हार में अहम भूमिका निभाते आए हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों में ये वोटर मायावती को छोड़ बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे के साथ खुद को जोड़ते नजर आए हैं. यही नहीं पिछले कुछ वक्त से मायावती के पॉलिटिकल स्टैंड को लेकर भी वोटर कन्फ्यूज है. मायावती जहां बीजेपी पर नर्म हैं वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर आक्रामक. जबकि 2019 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ थीं, और इसी गठबंधन के सहारे जीरो से 10 सीट का सफर भी तय किया.

पिछले एक दशक से जिसप्रकार बहुजन समाज पार्टी के राजनितिक सितारे बुलंदियों से नीचे गिर गए हैं. पार्टी और पार्टी नेता मायावती का उठ पाना बड़ा ही मुश्किल लग रहा है और इसी लिए पार्टी ने 2022 की नैया पार करने के लिए “प्रबुद्ध सम्मेलनों” का आयोजन कर एक बार फिर ब्राह्मण कार्ड खेल रही है.प्रबुद्ध सम्मेलन पुराने दौर की ब्राह्मण भाईचारा बैठकों का नया वर्जन हैं. सतीश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में उनके बेटे कपिल और दामाद परेश इन सम्मेलनों के जरिए विशेष तौर ब्राह्मण वर्ग को साधने का काम किया जा रहा है. ऐसा माना जाता है कि उत्तर प्रदेश के लगभग 12% मतदाता इसी समूह के हैं.

दलित नेता मायावती उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2007 के माहौल को फिर से बनाने की कोशिश कर रही हैं. उस चुनाव से पहले उनके द्वारा पूरे उत्तरप्रदेश में ब्राह्मण भाईचारे (बिरादरी) की बैठकों का दौर चलाया गया था, जहां सबने वर्ण व्यवस्था के शीर्ष और निचले क्रम का अप्रत्याशित गंठबंधन देखा. यही उनकी शानदार जीत का आधार बना था.

अब बात करें मायावती के चुनावी रिकॉर्ड की तो 14 अप्रैल 1984 को बनी बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपना पहला विधानसभा चुनाव साल 1993 में लड़ा था. 164 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बीएसपी को 67 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. करीब 11 फीसदी वोट मिले थे. पार्टी धीरे-धीरे ‘हाथी’ पर चढ़ती गई लेकिन 2012 से पार्टी कमजोर होती गई.2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीएसपी को 25.95% वोट मिले थे, लेकिन 2017 में ये घटकर 22.23% रह गए. इस चुनाव में बीजेपी ने 403 में से 312 सीटें जीती थीं. मतलब 39.67 फीसदी वोट. वहीं मायावती की बीएसपी के सिर्फ 19 विधायक ही सदन पहुंच सके. मायावती की करारी हार हुई थी. तबसे ही माना जा रहा है कि मायावती अपनी राजनीतिक जमीन खोती जा रही है.

2022 चुनावों का बिगुल बजने के साथ ही मायावती ने अनौपचारिक तौर पर कमान सतीश चंद्र मिश्रा को सौंप दी है. सतीश चंद्र मिश्र ही अब तक मायावती के भरोसेमंद साथी बने हुए हैं क्योंकि स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और राम अचल राजभर जैसे नेताओं का मायावती से साथ छूट चुका है. ऐसे में अब देखना महत्वपूर्ण होगा कि 2022 में मायावती की सेशल इंजिनियरिंग कितनी सफल रहती है और मायावती के साथ बसपा आनेवाले चुनावों में कितना प्रभाव रखती है.

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