यूरोप, रूस, आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान में भी मिलते हैं वैश्विक राम के साक्ष्य

ग्लोबल इन्साइक्लोपीडिया ऑफ रामायण योजना में केन्द्रीय संस्कृति विभाग, अयोध्या शोध संस्थान और बंगाल रामायण शोध समूह की ओर से अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। गूगल-मीट के माध्यम से हुए इस वेबिनार में राम-सीता के नाम पर रखे गए नदी-झीलों के नाम, प्रचलित सिक्कों और पहाड़ों की दीवार पर अंकित म्यूरल पेन्टिंग आदि के माध्यम से राम के वैश्विक छवि को उजागर किया गया।  

अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक योगेन्द्र प्रताप सिंह की परिकल्पना और जगमोहन रावत के तकनीकी संचालन में हुई इस वेबिनार में ग्लोबल इनसाइक्लोपीडिया रामायण प्रोजेक्ट की संयोजिका अनीता बोस ने बताया कि विभिन्न कारणों से विश्वभर में बस गए भारतीयों के कारण ही आज हिन्दुस्तान मूल के पुरुषोत्तम राम, वैश्विक नायक राम हो गए हैं। वैश्विक राम के केवल बाहरी रूपों में भिन्नताएं दिखती हैं पर मूल भाव में एक ही है। रूस और यूरोप से लेकर आस्ट्रेलिया तक में रामकथा के साक्ष्य इसके ठोस प्रमाण है। यहां तक की पाकिस्तान के मुल्तान में रामकथा के प्रमाण मिलते हैं।

भारतीय नारी कुशल प्रबंधक है वहीं आदर्श मित्र भी:-
वेबिनार के मुख्य अतिथि ऑस्ट्रेलिया के चिन्मय मिशन के आध्यात्मिक अध्यापक स्वामी श्रीकरानंद ने आस्ट्रेलिया में रामकथा के पहुंचने से लेकर उसकी परंपरा की वृहद जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रामकथा वहां के युवाओं को संस्कारित कर उनके दैनिज जीवन को भी प्रभावी बना रही है। अमेरिका स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस साइंस के प्रो.बलराम सिंह ने कहा कि रामायण इसलिए भी वैश्विक प्रेरक ग्रंथ है क्यों कि उसमें एक ओर जहां राम को पुरुषोत्तम बताया गया है वहीं उस काल की महिलाओं को भी अबला नहीं बल्कि संस्कारों की धनी श्रेष्ठ भारतीय नारी के रूप में स्थापित किया गया है। रामायण कालीन महिलाएं दार्शनिक है वहीं वह समाज सुधारक भी है। वह परिवार का नेतृत्व करती है वहीं युद्ध में योद्धा और कमांडर की भूमिका में भी दिखती हैं। वह कुशल प्रबंधक है वहीं आदर्श मित्र भी।

पूर्व एशिया के अलावा रामकथा के पर्याप्त साक्ष्य योरोप में:-
रूस स्थित दिशा संस्थान के संस्थापक-अध्यक्ष डॉ.रामेश्वर सिंह, रूस में रामायण की परंपरा की जानकारी दी। योरोप की शोधार्थी सास्वती बरदोलोई ने बताया कि दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के अलावा रामकथा के पर्याप्त साक्ष्य योरोप में भी मिलते हैं। इटली में प्राचीन इत्रस्की सभ्यता की दीवार में जो पेंटिंग्स तक में रामायण के साक्ष्य मिलते है। दरबंद-ए-बेलुला दीवार में ढाले गये वह चित्र लगभग दो हजार ईसापूर्व के हैं। उन्होंने बताया कि रूस के वोल्गा क्षेत्र में रामायण प्रभाव के प्रमाण मिलते है। रूस में सीता के नाम पर एक नदी और राम के नाम पर एक सुंदर झील है।  असम स्थित एल.सी.बी.कॉलेज के इतिहास विभाग की डॉ.इंद्राणी चौधरी ईरान की पर्शियन परंपरा में रामायण के साक्ष्यों की जानकारी दी।

पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर रामायण को साकार किया:-
उन्होंने बताया कि मुगल बादशाह अकबर के समय में फतेहपुर सीकरी में मकतबखाना-अनुवादघर हुआ करता था। उसमें अकबर ने रामायण का भी अनुवाद फारसी में अनुवाद करवाया था। पाकिस्तान स्थित गांधार पुरातत्व संस्थान के डॉ.सज्जद अली ने पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर रामायण और राम की अवधारणा को साकार किया। महाराष्ट्र निवासी, सिक्कों के संग्रहकर्ता और शोधकर्ता आशुतोष पाटिल ने विश्व भर में प्रचलित सिक्कों पर अंकित राम कथा के चिन्हों के माध्यम से वैश्विक नायक के रूप में राम को स्थापित किया। उन्होंने बताया कि भारत में मुद्रा की शुरुआत 2600 साल पहले हुई थी। उन्होंने बताया कि उज्जैन के गढ़कालिका अंकपात मार्ग महिदपुर से प्राप्त सिक्कों की एक सतह पर राम-दरबार का दृश्य है वहीं दूसरी सतह पर भगवान राम और लक्ष्मण के चित्र के साथ संवत् 1740 अंकित है। लेखक बाला राव इस वेबिनार के मोडरेटर रहे।

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