इसौली से बसपा ने यशभद्र सिंह उर्फ मोनू सिंह को बनाया अपना प्रत्याशी

सौली सीट से पराजय, सपा के अबरार अहमद ने भाजपा के प्रत्याशी ओम प्रकाश पाण्डेय (बजरंगी )को किया था पराजित।

सुल्तानपुर। बसपा ने बाहुबली ब्लॉक प्रमुख यशभद्र सिंह उर्फ मोनू को इसौली सीट से अपना प्रत्याशी बना कर उतार दिया है लोकसभा सुल्तानपुर सांसद मेनका गांधी की अब होगी अग्निपरीक्षा,मोदी लहर में भी भाजपा को मिली थी इसौली सीट से पराजय, सपा के अबरार अहमद ने भाजपा के प्रत्याशी ओम प्रकाश पाण्डेय (बजरंगी )को किया था पराजित।

बताते चलें कि  सुल्तानपुर में नए परिसीमन के हिसाब से स्थितियों में बदलाव आ गया है इसी इसौली विधानसभा सीट पर बसपा ने बड़ा दांव खेला है। बहुजन समाज पार्टी ने यहां से धनपतगंज के लोकप्रिय ब्लॉक प्रमुख यशभद्र सिंह उर्फ मोनू को अपना प्रत्याशी घोषित किया हैं मोनू वर्ष 2012 में पीस पार्टी से रनर तो 2017 में रालोद से लड़कर तीसरे स्थान पर थे। ऐसे में सांसद मेनका गांधी की अब यहां इसौली विधानसभा में अग्निपरीक्षा होगी क्योंकि इसौली में भाजपा से कई दावेदारो ने ताल ठोक रखी है जिसमें सबसे आगे पूर्व कैबिनेट मंत्री पं जय नारायण तिवारी,ओम प्रकाश पाण्डेय,ओम प्रकाश पाण्डेय बजरंगी,विकास शुक्ला आदि लोग हैं।

तो वही यशभद्र सिंह उर्फ मोनू के बड़े भाई पूर्व विधायक चंद्रभद्र सिंह उर्फ सोनू वर्ष 2002, 2007 में सपा और 2009 के उपचुनाव में बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए थे। इससे पूर्व इनके पिता इंद्रभद्र सिंह यहां से विधायक रह चुके हैं। साल 2012 में सोनू पीस पार्टी के टिकट पर सुलतानपुर विधानसभा सीट और मोनू इसी सिंबल पर इसौली विधानसभा सीट से चुनाव लड़े और हार गए थे। मोनू 2012 में रनर थे उन्हें सपा के अबरार अहमद ने परास्त किया था। 2017 के मोदी लहर होने के बाद भी सपा के सिंबल पर अबरार अहमद ने फिर बाजी मारी और बीजेपी के ओमप्रकाश पाण्डेय( बजरंगी) रनर रहे लेकिन उस समय भी मोनू 48 हजार वोट पाकर सम्मानजक स्थिति में थे।अब जब बसपा से उन्हें टिकट मिला है तो मुकाबला त्रिकोणीय हो गया जहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय, और मुस्लिम हैं।

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साथ ही साथ सीट का इतिहास ये रहा है कि सुल्तानपुर जिले के इसौली विधानसभा सीट पर पहला चुनाव 1952 में हुआ था इस चुनाव में मतदाताओं ने नाजिम अली को विधायक चुना था,इसके बाद 1957 में मतदाताओं ने कांग्रेस की यह सीट जनसंघ के पाले में डाल दी इस बार जनसंघ के गयाबक्स सिंह विधायक बने,1962 में रामबली मिश्र विधायक बने और यह सीट फिर कांग्रेस की झोली में डाल दी। यहां की जनता ने 1967 के चुनाव में रामबली मिश्र को फिर विधायक बनाकर विधानसभा भेजा। 1969 में फिर चुनाव हुआ तो इस बार भारतीय क्रान्ति दल के बैनर तले चुनाव लड़े रामजियावन दूबे ने यह सीट कांग्रेस से छीन ली। फिर 1974 में अम्बिका सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर इस सीट पर कब्जा कर लिया।

एक साल बाद ही 1975 में फिर चुनाव हुआ तो जनता पार्टी से रामबरन वर्मा ने चुनाव लड़ा और विधायक बने।1980 में जनता ने विधायक नहीं मुख्यमंत्री चुना,1980 के चुनाव में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्रीपति मिश्र यहां से विधायक बने और जनता ने इस बार विधायक नहीं प्रदेश का मुख्यमंत्री चुनकर भेजा था। चुनाव जीतने के बाद श्रीपति मिश्र सत्ता में रहते हुए वर्ष 1982 में प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। वहीं 1985 के चुनाव में इस बार भी कांग्रेस ने बाजी मारी और पं जय नारायन तिवारी विधायक चुने गए,1989 में इन्द्रभद्र सिंह ने जनता दल के निशान पर विजय हासिल की 1993 के चुनाव में श्री सिंह ने निर्दल चुनाव लड़कर विधानसभा का सफर तय किया।1996 में जय नारायन तिवारी कांग्रेस से बागी हो गये और हाथी पर सवार हो गए और इन्द्रभद्र सिंह को हरा कर विधायक बने ।

रिपोर्टर – संतोष पांडेय

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